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दर्द का कब्ज़ा

दिल में हो गया है दर्द का कब्ज़ा बहुत देर तलक हम सोते नहीं
अफ़सोस हमें भी है गमे जिंदगी पर हम यूँ फूटफूटकर रोते नहीं !

मंजिल मिली नहीं हमें पर गलत राहों में हम कभी खोते नहीं
आये मुसीबत हमारे यार पर और उड़ जाए ऐसे हम तोते नहीं !

चर्चे नदारद है महिफलों में, फिर भी नेक कामों में हम होते है
खबर चाहे नहीं अख़बारों में पर लोगों की दुओं में हम होते है !

जानते है हम की राह है मुश्किल है पर यूँ ही कहाँ हम हताश होते है
जिसमे जूनून और जज्बा नहीं वही लोग अक्सर जिंदगी से निराश होते है !



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मैंने सहमे सहमे से सन्नाटे से पुछा , तू इतना शोर क्यों मचा रहा हैं,       घबराकर इशारे से ख़ामोशी ने कहा, वो देखो भाई भाई का खून बहा रहा हैं ! लहू से लाल हुए पथ पर चलकर , नफरतों की दीवारों को फांदकर , मैं हक्का बक्का अपने मोहल्ले में आया, मैंने कोने में पड़े कूडेदान में इंसानियत को पाया !! हस्ते खेलते आँगन अब कब्रिस्तान हो गए , जात पात और धरम के बीच इंसान खो गए , एकजुट हुए लड़ने महँगाई, गरीबी भ्रष्टाचार से पर अब दंगो के बीच वो हिंदू मुस्लमान हो गए !!! रुक जाओ मूर्खो, संभल जाओ और थोडा सा थम जाओ, थोडा सा सयंम , थोडा सा धैर्य  जीवन में अपनाओ , समझों नादानों तुम रोक सकते हो यह बर्बादी , ताकि जश्न ना मना पाए हमारे दुखों पे खादी !!!!